तंत्र-मंत्र और मानव बलि: बलरामपुर में 2 साल के बच्चे के अपहरण की दिल दहला देने वाली घटना
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आधुनिक युग में जहां विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, वहीं कुछ लोग आज भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के चक्कर में अपनी जिंदगी को अंधेरे में धकेल रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने न केवल स्थानीय लोगों को बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।
यह घटना तंत्र-मंत्र और मानव बलि जैसी कुप्रथाओं के प्रति समाज में व्याप्त अंधविश्वास को उजागर करती है। इस मामले में एक दो साल के मासूम बच्चे को अपहरण कर उसकी बलि देने की कोशिश की गई, लेकिन गांव वालों की सतर्कता और समय पर हस्तक्षेप ने एक बड़ी अनहोनी को टाल दिया। आइए, इस घटना के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।
बलरामपुर में हुई हैरान करने वाली घटना
उत्तर प्रदेश का बलरामपुर जिला, जो आम तौर पर अपनी शांत और ग्रामीण जीवनशैली के लिए जाना जाता है, हाल ही में एक भयावह घटना का गवाह बना। यह घटना उतरौला थाना क्षेत्र के तेंदुआ तकिया गांव में शनिवार की शाम को घटी। एक दो साल का मासूम बच्चा, जिसका नाम अनमोल बताया गया, अपने घर के बाहर खेल रहा था।
शाम का समय था, बच्चे के माता-पिता शायद अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त थे, और इसी बीच बच्चा संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गया। जब बच्चे का कुछ देर तक पता नहीं चला, तो परिजनों ने उसकी खोजबीन शुरू की। शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद बच्चा कहीं पास-पड़ोस में चला गया होगा, लेकिन जब वह कहीं नहीं मिला, तो उनकी चिंता बढ़ गई।
परिजनों ने गांव वालों को इसकी सूचना दी, और जल्द ही पूरे गांव में बच्चे की तलाश शुरू हो गई। रातभर लोग इधर-उधर ढूंढते रहे, लेकिन बच्चे का कोई सुराग नहीं मिला। अगले दिन, यानी रविवार को, गांव वालों ने पड़ोस में रहने वाले लक्ष्मी नारायण कोरी के घर में तलाश करने का फैसला किया। यह वही शख्स था, जिसने इस भयावह अपराध को अंजाम देने की कोशिश की थी।

मिट्टी की डेहरी में छिपा था मासूम
लक्ष्मी नारायण के घर पहुंचे गांव वालों को उसका व्यवहार संदिग्ध लगा। जब लोग बच्चे की तलाश में उसके घर की मिट्टी की डेहरी की ओर बढ़े, तो लक्ष्मी नारायण ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उसकी यह हरकत लोगों के शक को और गहरा कर गई। गांव वालों ने उसकी बात को अनसुना करते हुए जबरन डेहरी को खोला, और जो दृश्य सामने आया, वह किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने वाला था। दो साल का मासूम अनमोल डेहरी के अंदर बेहोशी की हालत में पड़ा हुआ था।
बच्चे को देखते ही गांव वालों ने राहत की सांस ली, लेकिन साथ ही उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत लक्ष्मी नारायण को पकड़ लिया और पुलिस को सूचना दी।
बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) विकास कुमार ने बताया कि सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और बच्चे को सकुशल बरामद कर उसके परिजनों को सौंप दिया। आरोपी लक्ष्मी नारायण कोरी को हिरासत में ले लिया गया, और उससे पूछताछ शुरू की गई। पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि लक्ष्मी नारायण ने बच्चे को बेहोश कर डेहरी में इसलिए छिपाया था, ताकि वह अपने तंत्र-मंत्र के अनुष्ठान को पूरा कर सके।
तंत्र-मंत्र और सिद्धि की चाहत में अपहरण
पुलिस पूछताछ में लक्ष्मी नारायण ने जो खुलासा किया, वह इस घटना के पीछे की मानसिकता को समझने के लिए काफी है। उसने बताया कि वह तंत्र-मंत्र के जरिए सिद्धि हासिल करना चाहता था। उसके मुताबिक, इसके लिए उसे मानव बलि देनी थी, और उसने इसके लिए मासूम अनमोल को निशाना बनाया। बच्चे को अगवा करने के बाद उसने उसे बेहोश कर दिया और डेहरी में छिपा दिया। वह अनुष्ठान के लिए “उचित समय” का इंतजार कर रहा था, लेकिन गांव वालों की सतर्कता ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया।
पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर उसके घर से एक गड़ासा और छुरा भी बरामद किया, जो उसने मानव बलि के लिए रखा था। यह खुलासा इस बात का सबूत है कि लक्ष्मी नारायण पूरी तैयारी के साथ इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाला था। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर एक इंसान ऐसी सोच तक कैसे पहुंच सकता है?

लक्ष्मी नारायण की पृष्ठभूमि और मानसिक स्थिति
लक्ष्मी नारायण कोरी की जिंदगी में हाल के दिनों में कई दुखद घटनाएं घटी थीं, जो शायद उसकी इस हरकत के पीछे की वजह बनीं। जानकारी के मुताबिक, कुछ समय पहले उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। इसके अलावा, उसकी कोई संतान भी नहीं थी। इन घटनाओं ने उसके दिमाग पर गहरा असर डाला और वह कुंठित हो गया। ऐसा लगता है कि इसी कुंठा और अकेलेपन ने उसे तंत्र-मंत्र की ओर धकेल दिया। वह मानता था कि तंत्र-मंत्र के जरिए वह अपनी जिंदगी की समस्याओं को हल कर सकता है और सिद्धि प्राप्त कर सकता है। लेकिन इस अंधविश्वास ने उसे एक मासूम की जान लेने की ओर प्रेरित कर दिया।
समाज में अंधविश्वास की जड़ें
यह घटना केवल लक्ष्मी नारायण की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समाज में गहरे पैठ बना चुके तंत्र-मंत्र अंधविश्वास की एक कड़वी सच्चाई है। आज भी कई लोग तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और बलि जैसी प्रथाओं पर विश्वास करते हैं। ये लोग मानते हैं कि इनके जरिए वे अपनी जिंदगी की परेशानियों से छुटकारा पा सकते हैं या कोई अलौकिक शक्ति हासिल कर सकते हैं। लेकिन इस अंधविश्वास का परिणाम अक्सर ऐसी भयावह घटनाओं के रूप में सामने आता है।
बलरामपुर की यह घटना पहली नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर मानव बलि और तंत्र-मंत्र से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं। कभी संतान प्राप्ति के लिए, कभी धन की चाहत में, तो कभी बीमारी से छुटकारा पाने के लिए लोग इस तरह के कदम उठाते हैं। यह सोच न केवल उनकी जिंदगी को बर्बाद करती है, बल्कि दूसरों के लिए भी खतरा बन जाती है।

गांव वालों की सतर्कता और पुलिस की त्वरित कार्रवाई
इस तंत्र-मंत्र घटना में एक सकारात्मक पहलू यह रहा कि गांव वालों की सतर्कता और एकजुटता ने एक मासूम की जान बचा ली। अगर वे समय पर लक्ष्मी नारायण के घर नहीं पहुंचते और डेहरी की तलाशी नहीं लेते, तो शायद यह कहानी एक दुखद अंत के साथ खत्म होती। इसके साथ ही, पुलिस की त्वरित कार्रवाई भी सराहनीय रही। सूचना मिलते ही पुलिस ने न केवल बच्चे को सुरक्षित निकाला, बल्कि आरोपी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की।
निष्कर्ष: अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता की जरूरत
बलरामपुर की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कब तक हमारा समाज अंधविश्वास के इस दलदल में फंसा रहेगा? शिक्षा और जागरूकता के अभाव में लोग आज भी तंत्र-मंत्र और बलि जैसी प्रथाओं को अपनाते हैं, जो न केवल अवैज्ञानिक हैं, बल्कि अपराध की श्रेणी में भी आते हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार, सामाजिक संगठनों और आम लोगों को मिलकर काम करना होगा। स्कूलों में बच्चों को वैज्ञानिक सोच सिखाने, ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने और तांत्रिकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत है।
लक्ष्मी नारायण जैसे लोगों की मानसिक स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है। अकेलापन, दुख और कुंठा उन्हें इस रास्ते पर ले जाती है। ऐसे में समाज और परिवार का सहयोग उनकी जिंदगी को एक नई दिशा दे सकता है। अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि जब तक हम अंधविश्वास को जड़ से नहीं उखाड़ेंगे, तब तक इस तरह की घटनाएं हमारे समाज को शर्मसार करती रहेंगी। बलरामपुर की यह घटना एक चेतावनी है—हमें जागना होगा, वरना मासूमों की जान यूं ही खतरे में पड़ती रहेगी।