संजय सिंह सुसाइड केस: टारगेट के दबाव में टूटा एक अफसर, 800 ने छोड़ा व्हाट्सएप कमांड

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संजय सिंह सुसाइड केस: टारगेट के दबाव में टूटा एक अफसर, 800 ने छोड़ा व्हाट्सएप कमांड

संजय सिंह

हाल ही में नोएडा में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) डिप्टी कमिश्नर संजय सिंह की आत्महत्या ने न केवल उत्तर प्रदेश के राज्य कर विभाग में हड़कंप मचा दिया, बल्कि पूरे देश में सरकारी नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा दिए। इस घटना के बाद लगभग 800 जीएसटी अधिकारियों ने स्टेट टैक्स के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप को छोड़ दिया, जो विभागीय निर्देशों और कमांड का प्रमुख माध्यम था।

यह कदम न सिर्फ एक सामूहिक विरोध का प्रतीक बन गया, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकारी अधिकारियों पर कार्यभार और मानसिक दबाव कितना गंभीर रूप ले चुका है। इस ब्लॉग में हम इस मामले के हर पहलू को विस्तार से समझेंगे, इसके कारणों, प्रभावों और संभावित समाधानों पर चर्चा करेंगे।

संजय सिंह सुसाइड केस: घटना का पूरा ब्यौरा

संजय सिंह नोएडा में जीएसटी डिप्टी कमिश्नर के पद पर तैनात थे। उनकी आत्महत्या की खबर ने विभाग को झकझोर कर रख दिया। प्रारंभिक जांच और परिवार के बयानों के अनुसार, संजय सिंह पिछले कई महीनों से अत्यधिक तनाव में थे। उनकी पत्नी ने बताया कि वह अक्सर घर पर अपने काम के दबाव की शिकायत करते थे। टैक्स कलेक्शन के असंभव लक्ष्य, उच्च अधिकारियों की लगातार निगरानी और जवाबदेही का बोझ उनके लिए असहनीय हो गया था। एक दिन, संजय सिंह ने अपने घर में यह कठोर कदम उठा लिया, जिसने न केवल उनके परिवार को सदमे में डाल दिया, बल्कि उनके सहकर्मियों में भी गहरी नाराजगी पैदा कर दी।

पुलिस ने इस मामले में जांच शुरू की और संजय सिंह के मोबाइल फोन और अन्य दस्तावेजों की पड़ताल की। उनके फोन में स्टेट टैक्स व्हाट्सएप ग्रुप के मैसेजेस मिले, जिनमें टारगेट्स को लेकर सख्त निर्देश और लगातार अपडेट्स की मांग की गई थी। यह साफ हो गया कि संजय सिंह की आत्महत्या का कारण व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पेशेवर दबाव था। यह घटना मार्च 2025 के पहले सप्ताह में हुई, और इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया।

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800 अफसरों का सामूहिक विरोध: व्हाट्सएप ग्रुप का बहिष्कार

संजय सिंह की आत्महत्या के बाद जीएसटी विभाग में असंतोष की लहर फैल गई। अधिकारियों ने इस घटना को अपने ऊपर हो रहे अन्याय का प्रतीक माना। इसके जवाब में, उत्तर प्रदेश के लगभग 800 जीएसटी अधिकारियों ने स्टेट टैक्स के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप को छोड़ दिया। यह ग्रुप विभागीय संचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसमें रोजाना टैक्स कलेक्शन के आंकड़े, नए टारगेट्स, और उच्च अधिकारियों के निर्देश साझा किए जाते थे। कई बार रात में भी मैसेजेस आते थे, जिससे अधिकारियों को लगातार काम के दबाव में रहना पड़ता था।

जीएसटी ऑफीसर सर्विस एसोसिएशन ने इस मामले में तुरंत कदम उठाया। एसोसिएशन के अध्यक्ष ज्योति स्वरूप शुक्ला और महासचिव अरुण सिंह ने एक आपात बैठक बुलाई, जिसमें सैकड़ों अधिकारियों ने हिस्सा लिया। बैठक में यह तय हुआ कि कोई भी अधिकारी अब इस ग्रुप का हिस्सा नहीं रहेगा। इसके साथ ही, अधिकारियों ने काला फीता बांधकर काम करने का फैसला लिया, जो उनके शांतिपूर्ण विरोध का एक तरीका था। इस कदम का मकसद सरकार और विभाग के उच्च अधिकारियों का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर खींचना था।

विभाग में दबाव का माहौल: टारगेट्स का बोझ

जीएसटी विभाग में काम करने वाले अधिकारियों के लिए टैक्स कलेक्शन का लक्ष्य पिछले कुछ सालों में एक बड़ा सिरदर्द बन गया है। केंद्र और राज्य सरकारें जीएसटी को राजस्व का प्रमुख स्रोत मानती हैं। हर साल बजट में टैक्स कलेक्शन के लक्ष्य बढ़ाए जाते हैं, और इन लक्ष्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी अधिकारियों पर डाल दी जाती है। लेकिन कई बार ये लक्ष्य इतने अव्यावहारिक होते हैं कि इन्हें हासिल करना असंभव सा लगता है। उदाहरण के लिए, छोटे और मझोले व्यापारियों से टैक्स वसूलना आसान नहीं होता, क्योंकि उनके पास संसाधन सीमित होते हैं। फिर भी, अधिकारियों पर दबाव डाला जाता है कि वे किसी भी तरह टारगेट पूरा करें।

इसके लिए व्हाट्सएप ग्रुप जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इन ग्रुप्स में हर दिन प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगी जाती है, और अगर कोई अधिकारी टारगेट से पीछे रहता है, तो उसे सार्वजनिक रूप से जवाब देना पड़ता है। संजय सिंह के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ। उनके सहकर्मियों का कहना है कि वह एक मेहनती और ईमानदार अधिकारी थे, लेकिन लगातार दबाव और अपमान ने उन्हें तोड़ दिया। यह स्थिति सिर्फ संजय सिंह तक सीमित नहीं है; कई अन्य अधिकारी भी इसी तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं।

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मानसिक स्वास्थ्य पर असर: एक अनदेखी सच्चाई

संजय सिंह की आत्महत्या ने एक बड़े मुद्दे को उजागर किया है – सरकारी नौकरियों में मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी। भारत में सरकारी नौकरी को सम्मान और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत कई बार कड़वी होती है। जीएसटी जैसे विभागों में अधिकारियों को न केवल टारगेट्स का बोझ उठाना पड़ता है, बल्कि जनता के गुस्से और शिकायतों का भी सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, उच्च अधिकारियों की सख्ती और नौकरशाही की जटिलताएं उनके लिए काम को और मुश्किल बना देती हैं।

संजय सिंह की पत्नी ने बताया कि वह अक्सर रात में नींद नहीं ले पाते थे। उन्हें डर रहता था कि अगले दिन की रिपोर्ट में अगर आंकड़े कम हुए, तो उनकी आलोचना होगी। यह तनाव उनके निजी जीवन में भी घुस गया था। वह अपने बच्चों और परिवार के साथ समय नहीं बिता पाते थे। यह कहानी सिर्फ संजय सिंह की नहीं, बल्कि उन तमाम अधिकारियों की है जो इसी तरह के हालात से गुजर रहे हैं।

अधिकारियों की मांगें: क्या है उनका पक्ष?

800 अधिकारियों का व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ना और काला फीता बांधना महज एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। इसके पीछे उनकी कुछ ठोस मांगें हैं। पहली मांग है कि टैक्स कलेक्शन के टारगेट्स को तर्कसंगत बनाया जाए। उनका कहना है कि मौजूदा लक्ष्य जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। दूसरी मांग है कि अधिकारियों की मानसिक सेहत पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम की व्यवस्था की जानी चाहिए। तीसरी मांग है कि व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक माध्यमों की जगह औपचारिक संचार प्रणाली अपनाई जाए, ताकि अधिकारियों को हर समय निगरानी का अहसास न हो।

जीएसटी ऑफीसर सर्विस एसोसिएशन ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे हड़ताल जैसे बड़े कदम उठा सकते हैं। उनका कहना है कि संजय सिंह की मौत एक चेतावनी है, और इसे नजरअंदाज करना भविष्य में और नुकसानदायक हो सकता है।

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सरकार के सामने चुनौती और समाधान

यह घटना सरकार के लिए एक सबक है। राजस्व बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए कर्मचारियों की सेहत को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। सरकार को चाहिए कि वह जीएसटी विभाग की कार्यप्रणाली की समीक्षा करे। टारगेट्स को निर्धारित करने से पहले जमीनी स्तर पर अध्ययन किया जाए। इसके साथ ही, अधिकारियों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम और मेंटल हेल्थ सपोर्ट सिस्टम शुरू किए जाएं। व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक टूल्स की जगह एक प्रोफेशनल डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया जाए, जिसमें काम के घंटों का ध्यान रखा जाए।

समाज का दायित्व

यह मामला सिर्फ सरकार और अधिकारियों तक सीमित नहीं है। समाज के तौर पर हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर नौकरी में एक इंसान काम करता है, जिसकी अपनी भावनाएं और सीमाएं होती हैं। संजय सिंह जैसे लोगों के लिए परिवार और दोस्तों का सपोर्ट बेहद जरूरी होता है। हमें अपने आसपास के लोगों की मानसिक स्थिति पर नजर रखनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करनी चाहिए।

GST डिप्टी कमिश्नर संजय सिंह की आत्महत्या और इसके बाद 800 अधिकारियों द्वारा स्टेट टैक्स व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ना एक गंभीर संकेत है। यह घटना हमें बताती है कि कार्यस्थल का दबाव कितना खतरनाक हो सकता है। आज 15 मार्च 2025 है, और यह मामला अभी भी गर्म है। उम्मीद है कि सरकार और विभाग इस घटना से सबक लेंगे और अधिकारियों के हित में ठोस कदम उठाएंगे। संजय सिंह की मौत एक त्रासदी है, लेकिन अगर इससे सकारात्मक बदलाव आते हैं, तो उनकी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। यह समय है कि हम सब मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं, जहां काम और जीवन के बीच संतुलन हो, और हर इंसान की कीमत समझी जाए।

18 साल बाद जाल में: हिजबुल का उल्फत, जो मुरादाबाद में रच रहा था तबाही

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18 साल बाद जाल में: हिजबुल का उल्फत, जो मुरादाबाद में रच रहा था तबाही

 उल्फत

8 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश की एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) ने एक ऐसी खबर दी, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। मुरादाबाद के कटघर इलाके से हिजबुल मुजाहिद्दीन का एक खूंखार आतंकी, उल्फत हुसैन, 18 साल की फरारी के बाद आखिरकार पकड़ा गया। इस आतंकी पर 25,000 रुपये का इनाम था, और यह जम्मू-कश्मीर के पूंछ जिले का निवासी है।

उल्फत ने न सिर्फ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ट्रेनिंग ली थी, बल्कि वह मुरादाबाद में किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने की फिराक में था। आखिर कौन है यह उल्फत हुसैन? उसकी कहानी क्या है, और वह इतने सालों तक कैसे छिपता रहा? इस ब्लॉग में हम इस रहस्यमयी आतंकी की जिंदगी के हर पहलू को जानेंगे।

उल्फत हुसैन का परिचय

उल्फत हुसैन, जिसे कई नामों से जाना जाता है – मोहम्मद सैफुल इस्लाम, अफजाल, परवेज, और हुसैन मलिक – जम्मू-कश्मीर के पूंछ जिले के फजलाबाद (सुरनकोट) का मूल निवासी है। उसका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उसकी जिंदगी ने जल्द ही एक खतरनाक मोड़ ले लिया। 1990 के दशक के अंत में, जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, उल्फत ने हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठन की राह पकड़ ली। हिजबुल, जो 1989 में स्थापित हुआ था, कश्मीर को भारत से अलग करने और इस्लामिक शासन स्थापित करने के मकसद से काम करता है। उल्फत इस संगठन का सक्रिय सदस्य बन गया और उसकी जिंदगी का लक्ष्य राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को अंजाम देना बन गया।

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PoK में ट्रेनिंग: आतंक की शुरुआत

1999-2000 के बीच उल्फत हुसैन ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन के ट्रेनिंग कैंप में हिस्सा लिया। यहाँ उसे हथियार चलाने, विस्फोटक बनाने और आतंकी हमलों की योजना तैयार करने की कठिन ट्रेनिंग दी गई। उस दौर में PoK आतंकियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह था, जहाँ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI की मदद से कई संगठन भारत के खिलाफ साजिशें रचते थे। उल्फत ने यहाँ न सिर्फ तकनीकी कौशल सीखा, बल्कि आतंक के प्रति अपनी सोच को और मजबूत किया। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह भारत लौटा, लेकिन उसका मकसद अब आम जिंदगी जीना नहीं, बल्कि तबाही मचाना था।

मुरादाबाद में पहली गिरफ्तारी: 2001 का खुलासा

उल्फत हुसैन 2001 में मुरादाबाद पहुँचा। यहाँ वह असालतपुरा की एक मस्जिद में छिपकर रहने लगा और आतंकी नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिश में जुट गया। लेकिन उसकी योजना ज्यादा दिन तक छिपी न रह सकी। 9 जुलाई 2001 को मुरादाबाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसके पास से जो बरामद हुआ, उसने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया। एक AK-47, एक AK-56, दो 30 बोर पिस्टल, 12 हैंड ग्रेनेड, 39 टाइमर, 50 डेटोनेटर, 37 बैटरियाँ, 29 किलो विस्फोटक, 560 जिंदा कारतूस और 8 मैगजीन – यह हथियारों का जखीरा किसी बड़ी आतंकी वारदात की तैयारी का सबूत था।

पुलिस की पूछताछ में पता चला कि उल्फत धार्मिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में हमले की साजिश रच रहा था। उसके खिलाफ आर्म्स एक्ट, विस्फोटक अधिनियम, और आतंकवाद निवारण अधिनियम (POTA) के तहत केस दर्ज किया गया। उसे जेल भेज दिया गया, लेकिन उसकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

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जमानत और फरारी: 18 साल का खेल

2001 में गिरफ्तारी के बाद उल्फत हुसैन कुछ साल जेल में रहा। 2008 में उसे जमानत मिली, लेकिन उसने कानून का फायदा उठाकर फरार होने का रास्ता चुना। जमानत पर बाहर आने के बाद वह कोर्ट में कभी पेश नहीं हुआ। मुरादाबाद की अदालत ने 7 जनवरी 2015 को उसके खिलाफ स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किया और उसे फरार घोषित कर दिया। इसके बाद मुरादाबाद पुलिस ने उस पर 25,000 रुपये का इनाम घोषित किया। लेकिन उल्फत इतना चालाक था कि वह 18 साल तक पुलिस की नजरों से बचता रहा।

इस दौरान वह अलग-अलग नामों से अपनी पहचान छिपाता रहा। कभी वह मौलवी बनकर मस्जिदों में छिपा, तो कभी आम नागरिक की तरह भीड़ में घुलमिल गया। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह रामपुर और बरेली के मदरसों में भी पढ़ाई के बहाने रहा और वहाँ से युवाओं को आतंकी संगठन में भर्ती करने की कोशिश करता रहा। उसका नेटवर्क धीरे-धीरे फैल रहा था, और वह फिर से किसी बड़ी साजिश की तैयारी में था।

मुरादाबाद में दोबारा पकड़ा जाना: ATS की बड़ी कामयाबी

18 साल की लंबी फरारी के बाद, मार्च 2025 में यूपी ATS और मुरादाबाद पुलिस की संयुक्त टीम ने उल्फत हुसैन को फिर से मुरादाबाद के कटघर इलाके से धर दबोचा। यह गिरफ्तारी तकनीकी निगरानी और खुफिया जानकारी के आधार पर हुई। ATS के मुताबिक, उल्फत एक बार फिर मुरादाबाद में आतंकी हमले की साजिश रच रहा था। उसकी गिरफ्तारी से एक बड़ी तबाही टल गई। उसे कोर्ट में पेश किया गया और मेडिकल जाँच के बाद मुरादाबाद जेल भेज दिया गया।

ATS अब उसके नेटवर्क को खंगाल रही है। सूत्रों के मुताबिक, उल्फत की तीन शादियाँ हुई थीं और उसके पाँच बच्चे हैं। उसकी पत्नियाँ और बच्चे भी जम्मू-कश्मीर में रहते हैं। यह भी संदेह है कि वह ISI के संपर्क में था और उत्तर प्रदेश में युवाओं को भर्ती करने की योजना बना रहा था।

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उल्फत की कहानी से सबक

उल्फत हुसैन की जिंदगी एक ऐसी किताब है, जो हमें आतंक के अंधेरे रास्ते की सच्चाई दिखाती है। एक साधारण युवक से खूंखार आतंकी बनने तक का उसका सफर यह बताता है कि गलत रास्ता कितना खतरनाक हो सकता है। उसकी 18 साल की फरारी और फिर गिरफ्तारी यह भी साबित करती है कि कानून के हाथ भले ही देर से पहुँचें, लेकिन वह हर अपराधी को सजा देने में सक्षम हैं।

पश्चिमी यूपी में आतंक की पनाहगाह?

उल्फत की गिरफ्तारी ने एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को चर्चा में ला दिया। पिछले 20 सालों में यहाँ 30 से ज्यादा आतंकी और कई पाकिस्तानी जासूस पकड़े जा चुके हैं। मुरादाबाद, सहारनपुर, रामपुर जैसे इलाके आतंकियों के लिए “सुरक्षित पनाहगाह” बनते जा रहे हैं। इसका कारण यहाँ की घनी आबादी, जटिल सामाजिक संरचना और सीमा से निकटता हो सकती है। यह एक चिंता का विषय है, जिस पर सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को गंभीरता से काम करना होगा।

उल्फत हुसैन की कहानी सिर्फ एक आतंकी की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। यह हमें आतंकवाद के खिलाफ जंग की जटिलता, सुरक्षा बलों की मेहनत और समाज की जिम्मेदारी को समझाती है। 18 साल तक फरार रहने वाला यह आतंकी आखिरकार सलाखों के पीछे है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उसका नेटवर्क पूरी तरह खत्म हो पाएगा? क्या हम अपने युवाओं को ऐसी राह पर जाने से रोक पाएँगे? यह वक्त सोचने और कदम उठाने का है। उल्फत की गिरफ्तारी एक जीत है, लेकिन यह जंग अभी खत्म नहीं हुई। आइए, हम सब मिलकर एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण समाज बनाने की कोशिश करें।

महिला एशिया कप: एशियाई क्रिकेट में क्षमता और अंतर का उत्सव

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महिला एशिया कप: एशियाई क्रिकेट में क्षमता और अंतर का उत्सव

महिला एशिया कप

महिला एशिया कप क्रिकेट की दुनिया में एक उल्लेखनीय अवसर के रूप में विकसित हुआ है, जो एशिया भर में महिला क्रिकेटरों की आश्चर्यजनक क्षमता और अलग-अलग गुणों को प्रदर्शित करता है। यह प्रतियोगिता न केवल शामिल टीमों की प्रतिस्पर्धी भावना को उजागर करती है, बल्कि पुरुष क्रिकेट से प्रभावित क्षेत्र में महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जैसे-जैसे महिला एशिया कप की प्रसिद्धि बढ़ती जा रही है, यह खेलों के बढ़ते परिदृश्य की पुष्टि करता है, जहाँ लिंग समानता और महिलाओं के लिए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं।

संक्षिप्त इतिहास

महिला एशिया कप की शुरुआत 2004 में हुई थी, जिसमें केवल दो टीमें भाग ले रही थीं: भारत और श्रीलंका। तब से, इसमें और भी टीमें शामिल हो गई हैं, जिससे विकासशील क्रिकेट देशों को उच्च स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का मंच मिल गया है। प्रतियोगिता का आयोजन एशियाई क्रिकेट बोर्ड (एसीसी) द्वारा किया जाता है और यह ट्वेंटी-20 (टी-20) टूर्नामेंट की तरह है, जो अपनी तेज-तर्रार और रोमांचक प्रकृति के लिए जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में, महिला एशिया कप का कद बढ़ा है, मीडिया का दायरा बढ़ा है और प्रशंसकों का समर्थन भी बढ़ा है।

प्रभुत्व और प्रतिद्वंद्विता

महिला एशिया कप के इतिहास में भारत सबसे ज़्यादा प्रभावशाली टीम रही है, जिसने कई बार प्रतियोगिता जीती है। कुछ सबसे प्रतिभाशाली और प्रेरक क्रिकेटरों द्वारा संचालित भारतीय महिला टीम ने प्रतियोगिता में ऊंचे मानक स्थापित किए हैं। मिताली राज, हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ी घरेलू नाम बन गई हैं, जिन्होंने देश भर की युवा लड़कियों को क्रिकेट खेलने के लिए प्रेरित किया है।

हालांकि, अन्य टीमों ने भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। श्रीलंका और पाकिस्तान मजबूत दावेदार रहे हैं, जिनमें से प्रत्येक के पास अपने कुशल खिलाड़ियों का एक समूह है जो खेल में दिलचस्प गुण लाते हैं। एक प्रतिस्पर्धी टीम के रूप में बांग्लादेश के उदय ने प्रतियोगिता में एक उत्साहजनक ऊर्जा जोड़ी है। महिला एशिया कप के 2018 संस्करण में उनकी उल्लेखनीय जीत एक दिलचस्प क्षण था, जो उलटफेर की संभावना और टूर्नामेंट की बढ़ती प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है।

महिला एशिया कप

महिला क्रिकेट पर प्रभाव

महिला एशिया कप ने एशिया में महिला क्रिकेट के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसने महिला क्रिकेटरों को एक वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का एक मंच दिया है, जिससे चयनकर्ताओं, समर्थकों और प्रशंसकों का ध्यान आकर्षित हुआ है। इस तरह की हाई-प्रोफाइल प्रतियोगिता में भाग लेने से प्राप्त परिचय और भागीदारी ने क्षेत्र में महिला क्रिकेट के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसके अलावा, प्रतियोगिता ने युवा लड़कियों को क्रिकेट को करियर के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया है। जमीनी स्तर के कार्यक्रमों और क्रिकेट संस्थानों में महिला समर्थन में उछाल देखा गया है, जो महिला एशिया कप से विकसित होने वाली प्रतिभागी मॉडलों के हिस्से में काफी हद तक जिम्मेदार है। प्रतियोगिता से खिलाड़ियों की जीत की कहानियाँ इस बात का सक्षम उदाहरण हैं कि प्रतिबद्धता और कड़ी मेहनत से क्या हासिल किया जा सकता है।

उन्नति के बावजूद, एशिया में महिला क्रिकेट को अभी भी कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ढांचे की आवश्यकता, प्रशिक्षण केंद्रों तक सीमित पहुँच और सामाजिक सीमाएँ जैसे मुद्दे खेल के विकास को बर्बाद कर रहे हैं। फिर भी, महिला एशिया कप इन चुनौतियों का समाधान करने का एक उल्लेखनीय अवसर प्रस्तुत करता है। महिला क्रिकेट की छवि को बढ़ाकर और अधिक रुचि और उद्यम पैदा करके, प्रतियोगिता सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

इस संबंध में प्रायोजन और मीडिया का दायरा महत्वपूर्ण घटक हैं। टीवी प्रसारण और सोशल मीडिया के माध्यम से महिला एशिया कप की विस्तारित दृश्यता समर्थन आकर्षित कर सकती है, जिससे टीमों और उन्नत केंद्रों के लिए बेहतर वित्तपोषण हो सकता है। साथ ही, महिला मनोरंजन को बढ़ावा देने के लिए क्रिकेट पत्रिकाओं द्वारा की जाने वाली गतिविधियाँ और इसे पुरुषों के क्रिकेट कैलेंडर के साथ समन्वित करने से खेल के विकास को बढ़ावा मिल सकता है।

महिला एशिया कप

महिला एशिया कप का भविष्य

महिला एशिया कप का भविष्य आशाजनक लग रहा है, जिसमें अधिक टीमों के भाग लेने की उम्मीद है और प्रत्येक संस्करण के साथ क्रिकेट की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है। यह प्रतियोगिता महिला क्रिकेट में ICC महिला विश्व कप और महिला T20 विश्व कप के बाद सबसे महत्वपूर्ण आयोजनों में से एक बनने की क्षमता रखती है।

जैसे-जैसे यह प्रतियोगिता आगे बढ़ेगी, यह खेलों में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और क्रिकेट के माध्यम से महिलाओं को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। महिला एशिया कप से विकसित होने वाली बहुमुखी प्रतिभा, सहयोग और प्रतिभा की कहानियाँ आने वाले युगों को प्रेरित करती रहेंगी, जिससे एशिया और उससे आगे एक अधिक व्यापक और अलग क्रिकेट समुदाय का निर्माण होगा।

अंत में, महिला एशिया कप एक क्रिकेट प्रतियोगिता से कहीं बढ़कर है; यह एशिया में महिला क्रिकेटरों की क्षमता, अलग-अलग गुणों और अजेय आत्मा का उत्सव है। जैसे-जैसे यह आगे बढ़ेगा, यह निश्चित रूप से एक स्थायी स्थान बनाएगा। यह महिला क्रिकेट के भविष्य को आकार देने और खेलों में लैंगिक समानता के व्यापक विकास में योगदान देने के लिए समर्पित है।

नेल्सन मंडेला: विश्वास और लचीलेपन का मार्गदर्शक

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नेल्सन मंडेला

नेल्सन मंडेला, जिन्हें अक्सर मदीबा के नाम से जाना जाता है, जो उनका खोसा वंश का नाम है, एक ऐसी शख्सियत हैं जिनकी विरासत सीमाओं और युगों से ऊपर उठती है। 18 जुलाई, 1918 को दक्षिण अफ्रीका के छोटे से शहर म्वेज़ो में जन्मे मंडेला का जीवन एक यात्रा थी जिसमें अडिग लचीलापन, समानता के प्रति महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता और अपने लोगों की स्वतंत्रता के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता थी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

नेल्सन मंडेला के शुरुआती वर्षों में उनके पारंपरिक खोसा बचपन और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ उनके पूर्वजों के बहादुर प्रतिरोध की कहानियाँ शामिल थीं। उनके पिता, जो थेम्बू शाही परिवार के एक स्थानीय नेता और सलाहकार थे, ने युवा मंडेला में प्रशासन और समानता के मूल्यों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने पिता की मृत्यु के बाद, मंडेला को थेम्बू लोगों के नेता, चीफ जोंगिंटाबा दलिंडयेबो के संरक्षण में ले जाया गया, जिन्होंने उन्हें शिक्षा दी और अफ्रीकी नेतृत्व की जटिलताओं से अवगत कराया।

नेल्सन मंडेला की शैक्षणिक यात्रा स्थानीय मिशन स्कूल से शुरू हुई और प्रतिष्ठित कॉलेज ऑफ़ पोस्ट रैबिट में आगे बढ़ी, जो उस समय दक्षिणी अफ़्रीका में अश्वेत लोगों के लिए आयोजित एक पश्चिमी शैली की उच्च शिक्षा थी। यहीं पर मंडेला ने राजनीतिक रूप से सक्रिय होना शुरू किया और कॉलेज की नीतियों के खिलाफ़ छात्र असंतोष में शामिल हुए।

राजनीति में प्रवेश

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, मंडेला जोहान्सबर्ग चले गए, जहाँ उन्होंने अपनी कानून की डिग्री पूरी करने के दौरान एक नाइट गार्जियन के रूप में काम किया। इस व्यस्त शहर में, उन्होंने रंगभेद के क्रूर तत्वों का सामना किया, जो दक्षिण अफ़्रीकी सरकार द्वारा समर्थित संस्थागत नस्लीय अलगाव और अलगाव की एक प्रणाली थी। समानता और संतुलन के लिए लड़ने का मंडेला का संकल्प 1944 में अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस (ANC) में शामिल होने के बाद और मजबूत हुआ।

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ANC के एक भाग के रूप में, मंडेला तेजी से पदों पर पहुंचे, ANC युवा संघ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने रंगभेद को समाप्त करने के लिए अधिक कट्टरपंथी दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। उन्होंने 1952 के विद्रोह अभियान के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो दमनकारी कानूनों के खिलाफ एक विशाल अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन था।

रिवोनिया परीक्षण और कारावास

नेल्सन मंडेला की सक्रियता ने उन्हें रंगभेद प्रशासन का लक्ष्य बना दिया। 1962 में, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हड़तालों को बढ़ावा देने और देश को गलत तरीके से खाली करने के लिए पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई। एक साल बाद, जब वे अभी भी जेल में थे, तो उन पर और अन्य ANC अग्रदूतों पर सरकार को हटाने के लिए हमला करने और योजना बनाने का आरोप लगाया गया, जिसे रिवोनिया परीक्षण के रूप में जाना जाता है।

नेल्सन मंडेला

मुकदमे के दौरान, मंडेला ने कटघरे से एक सक्षम भाषण दिया, जिसमें मोटे तौर पर कहा गया था, “मैंने बहुमत के शासन और स्वतंत्र समाज के आदर्श को संजोया है जिसमें सभी लोग एक साथ सहमति से और अवसरों के साथ रहते हैं। यह एक आदर्श है जिसके लिए मैं तैयार हूं।” 1964 में, उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और केप टाउन के तट पर एक अधिकतम सुरक्षा जेल, रॉबेन द्वीप पर कैद कर दिया गया।

लड़ाई जारी है

नेल्सन मंडेला के जेल में बिताए 27 साल व्यक्तिगत कठिनाई और राजनीतिक अथक परिश्रम दोनों से प्रभावित थे। क्रूर परिस्थितियों के बावजूद, उन्होंने सलाखों के पीछे से ही नेतृत्व करना और जगाना जारी रखा। जेल से लिखे गए उनके पत्रों और रचनाओं ने दक्षिण अफ्रीका और दुनिया भर में रंगभेद विरोधी आंदोलन को गति दी। मंडेला की स्थिति नस्लीय उत्पीड़न के खिलाफ व्यापक लड़ाई का प्रतीक बन गई।

1980 के दशक में, जब रंगभेद के खिलाफ वैश्विक दबाव बढ़ा, तो दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने मंडेला के साथ गुप्त समझौते शुरू किए। इन वार्ताओं ने एक समतापूर्ण समाज की ओर एक शांत कदम की नींव रखी।

रिहाई और राष्ट्रपति पद

11 फरवरी, 1990 को, नेल्सन मंडेला 27 वर्षों के बाद विक्टर वर्स्टर जेल से मुक्त हुए। उनकी रिहाई ने दक्षिण अफ़्रीकी इतिहास में एक अप्रयुक्त समय की शुरुआत को रोक दिया। मंडेला ने तुरंत ANC में अपनी आधिकारिक भूमिका जारी रखी, रंगभेद को खत्म करने और बहुजातीय लोकतंत्र का निर्माण करने के लिए जोरदार तरीके से काम किया।

नेल्सन मंडेला

1993 में, मंडेला और तत्कालीन दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति एफ.डब्ल्यू. डी क्लार्क को रंगभेद को शांतिपूर्वक समाप्त करने के उनके प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अगले वर्ष, मंडेला को देश के पहले पूर्ण बहुमत वाले चुनाव में दक्षिण अफ़्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में चुना गया।

वसीयत और प्रभाव

नेल्सन मंडेला के प्रशासन (1994-1999) की विशेषता समझौता और राष्ट्र-निर्माण के माध्यम से अत्यधिक विभाजित देश को सुधारने के प्रयासों से थी। उन्होंने सत्य और समझौता आयोग का गठन किया, जिसका उद्देश्य रंगभेद काल के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में सच्चाई को उजागर करना और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना था।

अपने प्रशासन से परे, मंडेला शांति, सामाजिक समानता और मानवाधिकारों के लिए एक विश्वव्यापी वकील बने रहे। उन्होंने नेल्सन मंडेला प्रतिष्ठान की स्थापना की, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने में उनके काम को आगे बढ़ाता है।

नेल्सन मंडेला का निधन 5 दिसंबर, 2013 को हुआ, लेकिन उनकी विरासत कायम है। उन्हें न केवल एक स्वतंत्रता योद्धा और दुर्व्यवहार के खिलाफ प्रतिरोध की छवि के रूप में याद किया जाता है, बल्कि एक ऐसे अग्रणी के रूप में भी याद किया जाता है, जिन्होंने क्षमा और समझौता को अपनाया। मंडेला का जीवन और कार्य स्वतंत्रता के नियंत्रण, समानता के लिए खड़े होने के महत्व और एक व्यक्ति द्वारा दुनिया पर पड़ने वाले दृढ़ प्रभाव की पुष्टि के रूप में कार्य करता है।

नेल्सन मंडेला का जश्न मनाते हुए, हम संचार, स्वतंत्रता और मानवता के मानकों के लिए प्रतिबद्ध एक जीवन का सम्मान करते हैं। उनकी कहानी दुनिया भर में असंख्य व्यक्तियों को एक बेहतर, अधिक निष्पक्ष दुनिया के लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करती है।

लोकसभा चुनाव 2024: अमित शाह, प्रियंका गांधी और सीएम योगी में सत्ता संग्राम

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प्रियंका गांधी

भ्रष्टाचार करोगे तो जेल जाने से कोई नहीं रोक पायेगा; अमित शाह का प्रहार

गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर प्रहार करते हुए कहा कि राहुल बाबा कहते हैं की धारा 370 वापस ले लेंगे, ट्रिपल तलाक बिल वापस करेंगे| अमित शाह ने कहा कि अखिलेश यादव ने 2021 में सरदार पटेल की प्रतिमा के उद्घाटन के समय पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को महान नेता बताया था| वोट बैंक के लिए जो जिन्ना को महान बताता है उसे वोट देना चाहिए क्या? अखिलेश इतिहास ढंग से पढ़ ले| भारत माता के दो टुकड़े करवाने वाला जिन्ना ही था|

कन्नौज, हरदोई और लखीमपुर खीरी में उन्होंने कहा कि इंडी गठबंधन के समय में साढ़े 12 लाख करोड रुपए के घपले-घोटाले हुए हैं| झारखंड में कांग्रेस सांसद के घर से साढे तीन सौ करोड़ रुपये, ममता बनर्जी के मंत्री के घर से 50 करोड़ रूपए कैश पकड़ा जाता है और फिर वह ईडी और सीबीआई को भला-बुरा कहते हैं| मैं राहुल गांधी और अखिलेश यादव से यही कहना चाहूंगा कि भ्रष्टाचार करोगे तो पकड़े भी जाओगे और जेल भी जाओगे| कोई रोक नहीं सकता है| उन्होंने आगे कहा कि 23 साल तक सीएम और आज तक पीएम रहने के बावजूद 25 पैसे का भी आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नहीं है|

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अमित शाह ने आगे कहा कि वोट बैंक के डर से श्री राम मंदिर के भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी नहीं गए थे| उन्होंने कहा कि एक और इंडी गठबंधन है जिसके राज में रोज बम धमाके होते थे| पाकिस्तान से आलिया, मालिया, जमालिया घुस जाते थे और बम धमाके करते थे| दूसरी तरफ मोदी जी हैं जिन्होंने पुलवामा में हमला हुआ तो पाकिस्तान के घर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करके आतंकियों का सफाया कर दिया|

उत्तर प्रदेश ने पिछली बार भाजपा को 64 सीटें दी थी पर अब की बार 80 में से 80 सीटें भाजपा को मिल रहीं हैं| आगे उन्होंने कहा कि मोदी ने गरीबों का कल्याण, युवाओं का सम्मान, किसानों को सही स्थान, नारी शक्ति का गुणगान करने का काम किया है| एक तरफ विपक्षी बेटे-बेटी, पति-पत्नी, भतीजे को सीएम और पीएम बनना चाहते हैं तो दूसरी तरफ मोदी जी किसानों, युवाओं और गरीबों व कल्याण करना चाहते है|

अमित शाह ने कहा कि हरदोई अटल जी की कर्मभूमि रही है| सन 1962 में हरदोई ने दीपक जलाकर जनसंघ को आगे बढ़ने का काम किया था| वह निमंत्रण दे रहे हैं कि 6 जून को मिश्रिख वालों 400 लड्डू लेकर दिल्ली जरूर आइएगा| 409 नए सांसदों को लड्डू खिलाना है| उन्होंने वंदे मातरम व भारत माता की जय के उद्घोष के साथ भाषण का समापन किया|

प्रियंका गांधी

कांग्रेस के घोषणा पत्र में मुस्लिम लीग की छाप; सीएम योगी का पलटवार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि कांग्रेस का घोषणा पत्र अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़ों और भारत की सनातन आस्था के प्रति अन्याय पत्र है| यह मुस्लिम लीग के नए वर्जन के जैसा है| अगर देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल का घोषणा पत्र मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व करता हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता है|

बुधवार को चुनाव प्रचार के लिए निकलने से पूर्व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखनाथ मंदिर परिसर में मीडिया से बातचीत की| कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी द्वारा भाजपा पर नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाने के सवाल पर योगी आदित्यनाथ ने पलटवार किया| उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति जानता है कि बांटो और राज करो की नीति कांग्रेस को विरासत में मिली है|

अंग्रेजों की कुटिल चाल को 1947 में कांग्रेस ने सफल होने दिया और देश का बंटवारा कर दिया| उन्होंने कहा कि अब कांग्रेसी जनता की आंखों में धूल झोंक सत्ता नहीं हथिया पाएंगे क्योंकि नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पूरा देश एकजुट है| मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आजादी के बाद राजनीतिक स्वार्थ के कारण जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर देश में वर्ग संघर्ष को कांग्रेस ने बढ़ावा दिया है|

जनता के सवालों पर मौन साध लेते हैं प्रधानमंत्री मोदी; प्रियंका गांधी का तंज

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने बुधवार को भाजपा पर गुमराह करने का आरोप लगाया है| कांग्रेस प्रत्याशी राहुल गांधी के प्रचार के लिए दो दिनों से रायबरेली में प्रवास कर रही प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी हमला बोला| प्रियंका गांधी ने कहा कि मोदी जी जनता के सवालों पर मौन साध लेते हैं| जनता को 5 किलो राशन दे दो, लेकिन रोजगार नहीं देना है| सैम पित्रोदा के बयान पर प्रियंका गांधी ने कहा की अमेरिका में किसी ने उल्टा-सीधा बयान दे दिया तो उसको कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस की नीति है|

प्रियंका गांधी

रायबरेली के बछरावां विधानसभा क्षेत्र में जनसम्पर्क एवं नुक्कड़ सभाओं में प्रियंका गांधी ने कहा कि पूरी बीजेपी मशीनरी राहुल गांधी के खिलाफ लगी है| उनकी संसद सदस्यता और घर को छीना गया है| तमाम अवरोधों के बाद भी राहुल गांधी ने अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रखी है| प्रियंका ने कहा कि भाजपा ने आम जनता को गुमराह किया है| उनको लगता है कि 5 किलो अनाज देकर वे आपको आत्मनिर्भर बना देंगे, जबकि वह आपके सम्मान को छीनकर आपको सरकार के ऊपर निर्भर रहना सिखा रहे हैं|

प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार अंबानी-अडानी को सारी संपत्ति दे रही है| एयरपोर्ट, पोर्ट, कोयला खदान आदि सब उनको दिया जा रहा है| प्रियंका गांधी ने कहा कि कांग्रेस ही सिर्फ अडानी-अंबानी को लेकर बोलती है|

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क्या अरविंद केजरीवाल जीत पाएंगे यह लड़ाई?

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केजरीवाल

भारत का पडोसी देश चीन है, जिसके महान युद्ध और कला के शिक्षक सुन जू ने ईसा मसीह के जन्म से करीब 550 साल पहले यह कहा था कि, “राजनीती में दिखावा ही सब कुछ है और वंचनायें इस पर खड़ी होती हैं|” लेकिन सुन जू को क्या मालूम था कि लगभग 2500 साल बाद, दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक भारत देश में यह खेल अपने चरम पर होगा| अगर विश्वास ना हो, तो नई दिल्ली की अदालतों और सियासी सर्कस में जारी दांव-पेंच देख लीजिये| प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारी अदालत में शराब घोटाले को सही साबित करने का प्रयास कर रहे हैं|

ईडी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह के अलावा कई और लोगों को गिरफ्तार किया है जो आम आदमी पार्टी से नाता रखते हैं|इनमें से राज्यसभा सदस्य संजय सिंह को मिली जमानत नए राजनीतिक तरंगें पैदा कर गई है| आला अदालत में संजय सिंह के वकील की दलील थी कि मेरे मुवक्किल को बेवजह बंद किया गया है, क्योंकि जांच एजेंसी दो साल से इस मामले में जांच कर रही है और वह अभी तक कोई “मनी-ट्रेल” नहीं ढूंढ पाई है| यही नहीं, जिस गवाह दिनेश अरोड़ा के बयान पर वह गिरफ्तार किए गए थे, उसने अपने शुरुआती 9 बयानों में संजय सिंह का नाम तक नहीं लिया था|

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संजय सिंह का आरोप, केजरीवाल के खिलाफ दिया गया झूठा बयान

संजय सिंह के वकील ने सवाल उठाया कि वह कौन सी वजहें थीं कि उस गवाह ने अपनी 10वीं गवाही में सांसद का नाम लिया? इस दलील का संज्ञान लेते हुए आला अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिवक्ता से इसका जवाब मांगा| उत्तर देने के बजाय ईडी ने इस बार जमानत याचिका का विरोध न करने का फैसला किया| संजय सिंह अब जेल से बाहर आ चुके हैं और आरोप लगा रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल के खिलाफ झूठा बयान देने के लिए आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के सांसद मगुंटा श्रीनिवासुलू रेड्डी पर लगातार दबाव बनाया गया और जब उन्होंने इस बात पर इंकार कर दिया, तो उनके बेटे राघव रेड्डी को गिरफ्तार कर लिया गया|

केजरीवाल

कई चरणों की पूछताछ के बाद उसने केजरीवाल के बारे में अपना बयान बदला| संजय सिंह आला अदालत के आदेश की बाध्यता के कारण अपने मामले में बोलने से बचते रहे| उन्हें काफी मेहनत से हासिल हुई जमानत की शर्तों में साफ तौर पर दर्ज है कि वह अपने मुकदमे पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे| इसीलिए उन्होंने अपने मुक्यमंत्री केजरीवाल के बहाने से अपनी बात कही| इससे यह भी तय होता है कि आम आदमी पार्टी अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी का चुनावी लाभ उठाना चाहती है| इसी रणनीति के तहत नए पोस्टर जारी किए जा रहे हैं, जिसमें केजरीवाल को सलाखों के पीछे दर्शाया गया है|

कभी दूसरों पर कटाक्ष करते थे केजरीवाल, आज खुद पर नौबत आ गई

भारत की राजनीति में यह कोई नया प्रयोग नहीं है क्योंकि बड़ौदा डायनामाइट मामले में कैद जॉर्ज फर्नांडिस ने भी ऐसे ही चुनाव लड़ा था| भारत की सबसे बड़ी राजनितिक पार्टी, भारतीय जनता पार्टी भी चुप नहीं बैठी हुई है| उसकी ओर से कहा जा रहा है की जमानत को लेकर इतना खुश होना गलत है, क्योंकि अभी भी जाँच जारी है और पूरा मुकदमा अभी बाकी है| स्पष्ट है, इन मौखिक लड़ाइयों के जरिये राजनेता आम जनता की अदालत से मनचाहा परिणाम हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं| भला रोजमर्रा की जद्दोजहद में फंसा हुआ एक आम मतदाता कैसे इन कठिन मुद्दों पर किसी परिणाम तक पहुंच सकता है?

सियासी सिद्धांतों और वादों की नियत पर इसी मुकाम पर प्रश्नचिन्ह आ जाते हैं| अरविंद केजरीवाल किसी जमाने में स्थापित नेताओं, राजनीतिक दलों, उद्योगपतियों, पत्रकारों, और विचारकों को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए आए थे| केजरीवाल वैकल्पिक राजनीति की बात करते थे, लेकिन जब पहली बार बहुमत से सरकार बनाने में सक्षम ना हो पाए तो उन्होंने कांग्रेस का सहारा लिया| यह इस साल के लोकसभा चुनाव में उस कांग्रेस के साथ लड़ रहे हैं जिसके दिमाग पर आज भी गांधीवाद सवार हुआ है और जिसके लिए गांधी परिवार ही सब कुछ है|

क्या केजरीवाल की पत्नी बनेगी मुख्यमंत्री?

कभी केजरीवाल उन्हें सलाखों के पीछे डालने की बात करते थे| इसी तरह, वह और उनके साथ ही लगभग सारे नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की मांग करते थे| आज वह खुद भ्रष्टाचार के आरोप में तिहाड़ जेल में कैद है लेकिन इस्तीफा नहीं देना चाहते, और जेल से ही सरकार चलाना चाहते हैं| इस हफ्ते की शुरुआत में पार्टी के कुल 62 में से 56 विधायक केजरीवाल के आवास पर इकट्ठा हुए और केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल से कहा कि आप मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तक हमारी यह मन की भावना पहुंचा दें कि वह इस्तीफा न दें, हम सभी उनके साथ हैं|

केजरीवाल

इसके बाद से सवाल उठने लगे हैं कि अगर अरविंद केजरीवाल लंबे वक्त तक जेल में बंद रहते हैं और उन्हें इस्तीफा या त्यागपत्र देने पर मजबूर होना पड़ता है तो क्या उनकी जगह कमान उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल के हाथों में होगी?इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के टारगेट में पार्टी के तमाम फायर ब्रांड नेता हैं, वह राघव चड्ढा और सौरव भारद्वाज को भी जेल भेज सकते हैं |

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