संजय सिंह सुसाइड केस: टारगेट के दबाव में टूटा एक अफसर, 800 ने छोड़ा व्हाट्सएप कमांड

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संजय सिंह सुसाइड केस: टारगेट के दबाव में टूटा एक अफसर, 800 ने छोड़ा व्हाट्सएप कमांड

संजय सिंह

हाल ही में नोएडा में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) डिप्टी कमिश्नर संजय सिंह की आत्महत्या ने न केवल उत्तर प्रदेश के राज्य कर विभाग में हड़कंप मचा दिया, बल्कि पूरे देश में सरकारी नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा दिए। इस घटना के बाद लगभग 800 जीएसटी अधिकारियों ने स्टेट टैक्स के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप को छोड़ दिया, जो विभागीय निर्देशों और कमांड का प्रमुख माध्यम था।

यह कदम न सिर्फ एक सामूहिक विरोध का प्रतीक बन गया, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकारी अधिकारियों पर कार्यभार और मानसिक दबाव कितना गंभीर रूप ले चुका है। इस ब्लॉग में हम इस मामले के हर पहलू को विस्तार से समझेंगे, इसके कारणों, प्रभावों और संभावित समाधानों पर चर्चा करेंगे।

संजय सिंह सुसाइड केस: घटना का पूरा ब्यौरा

संजय सिंह नोएडा में जीएसटी डिप्टी कमिश्नर के पद पर तैनात थे। उनकी आत्महत्या की खबर ने विभाग को झकझोर कर रख दिया। प्रारंभिक जांच और परिवार के बयानों के अनुसार, संजय सिंह पिछले कई महीनों से अत्यधिक तनाव में थे। उनकी पत्नी ने बताया कि वह अक्सर घर पर अपने काम के दबाव की शिकायत करते थे। टैक्स कलेक्शन के असंभव लक्ष्य, उच्च अधिकारियों की लगातार निगरानी और जवाबदेही का बोझ उनके लिए असहनीय हो गया था। एक दिन, संजय सिंह ने अपने घर में यह कठोर कदम उठा लिया, जिसने न केवल उनके परिवार को सदमे में डाल दिया, बल्कि उनके सहकर्मियों में भी गहरी नाराजगी पैदा कर दी।

पुलिस ने इस मामले में जांच शुरू की और संजय सिंह के मोबाइल फोन और अन्य दस्तावेजों की पड़ताल की। उनके फोन में स्टेट टैक्स व्हाट्सएप ग्रुप के मैसेजेस मिले, जिनमें टारगेट्स को लेकर सख्त निर्देश और लगातार अपडेट्स की मांग की गई थी। यह साफ हो गया कि संजय सिंह की आत्महत्या का कारण व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पेशेवर दबाव था। यह घटना मार्च 2025 के पहले सप्ताह में हुई, और इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया।

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800 अफसरों का सामूहिक विरोध: व्हाट्सएप ग्रुप का बहिष्कार

संजय सिंह की आत्महत्या के बाद जीएसटी विभाग में असंतोष की लहर फैल गई। अधिकारियों ने इस घटना को अपने ऊपर हो रहे अन्याय का प्रतीक माना। इसके जवाब में, उत्तर प्रदेश के लगभग 800 जीएसटी अधिकारियों ने स्टेट टैक्स के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप को छोड़ दिया। यह ग्रुप विभागीय संचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसमें रोजाना टैक्स कलेक्शन के आंकड़े, नए टारगेट्स, और उच्च अधिकारियों के निर्देश साझा किए जाते थे। कई बार रात में भी मैसेजेस आते थे, जिससे अधिकारियों को लगातार काम के दबाव में रहना पड़ता था।

जीएसटी ऑफीसर सर्विस एसोसिएशन ने इस मामले में तुरंत कदम उठाया। एसोसिएशन के अध्यक्ष ज्योति स्वरूप शुक्ला और महासचिव अरुण सिंह ने एक आपात बैठक बुलाई, जिसमें सैकड़ों अधिकारियों ने हिस्सा लिया। बैठक में यह तय हुआ कि कोई भी अधिकारी अब इस ग्रुप का हिस्सा नहीं रहेगा। इसके साथ ही, अधिकारियों ने काला फीता बांधकर काम करने का फैसला लिया, जो उनके शांतिपूर्ण विरोध का एक तरीका था। इस कदम का मकसद सरकार और विभाग के उच्च अधिकारियों का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर खींचना था।

विभाग में दबाव का माहौल: टारगेट्स का बोझ

जीएसटी विभाग में काम करने वाले अधिकारियों के लिए टैक्स कलेक्शन का लक्ष्य पिछले कुछ सालों में एक बड़ा सिरदर्द बन गया है। केंद्र और राज्य सरकारें जीएसटी को राजस्व का प्रमुख स्रोत मानती हैं। हर साल बजट में टैक्स कलेक्शन के लक्ष्य बढ़ाए जाते हैं, और इन लक्ष्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी अधिकारियों पर डाल दी जाती है। लेकिन कई बार ये लक्ष्य इतने अव्यावहारिक होते हैं कि इन्हें हासिल करना असंभव सा लगता है। उदाहरण के लिए, छोटे और मझोले व्यापारियों से टैक्स वसूलना आसान नहीं होता, क्योंकि उनके पास संसाधन सीमित होते हैं। फिर भी, अधिकारियों पर दबाव डाला जाता है कि वे किसी भी तरह टारगेट पूरा करें।

इसके लिए व्हाट्सएप ग्रुप जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इन ग्रुप्स में हर दिन प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगी जाती है, और अगर कोई अधिकारी टारगेट से पीछे रहता है, तो उसे सार्वजनिक रूप से जवाब देना पड़ता है। संजय सिंह के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ। उनके सहकर्मियों का कहना है कि वह एक मेहनती और ईमानदार अधिकारी थे, लेकिन लगातार दबाव और अपमान ने उन्हें तोड़ दिया। यह स्थिति सिर्फ संजय सिंह तक सीमित नहीं है; कई अन्य अधिकारी भी इसी तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं।

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मानसिक स्वास्थ्य पर असर: एक अनदेखी सच्चाई

संजय सिंह की आत्महत्या ने एक बड़े मुद्दे को उजागर किया है – सरकारी नौकरियों में मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी। भारत में सरकारी नौकरी को सम्मान और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत कई बार कड़वी होती है। जीएसटी जैसे विभागों में अधिकारियों को न केवल टारगेट्स का बोझ उठाना पड़ता है, बल्कि जनता के गुस्से और शिकायतों का भी सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, उच्च अधिकारियों की सख्ती और नौकरशाही की जटिलताएं उनके लिए काम को और मुश्किल बना देती हैं।

संजय सिंह की पत्नी ने बताया कि वह अक्सर रात में नींद नहीं ले पाते थे। उन्हें डर रहता था कि अगले दिन की रिपोर्ट में अगर आंकड़े कम हुए, तो उनकी आलोचना होगी। यह तनाव उनके निजी जीवन में भी घुस गया था। वह अपने बच्चों और परिवार के साथ समय नहीं बिता पाते थे। यह कहानी सिर्फ संजय सिंह की नहीं, बल्कि उन तमाम अधिकारियों की है जो इसी तरह के हालात से गुजर रहे हैं।

अधिकारियों की मांगें: क्या है उनका पक्ष?

800 अधिकारियों का व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ना और काला फीता बांधना महज एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। इसके पीछे उनकी कुछ ठोस मांगें हैं। पहली मांग है कि टैक्स कलेक्शन के टारगेट्स को तर्कसंगत बनाया जाए। उनका कहना है कि मौजूदा लक्ष्य जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। दूसरी मांग है कि अधिकारियों की मानसिक सेहत पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम की व्यवस्था की जानी चाहिए। तीसरी मांग है कि व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक माध्यमों की जगह औपचारिक संचार प्रणाली अपनाई जाए, ताकि अधिकारियों को हर समय निगरानी का अहसास न हो।

जीएसटी ऑफीसर सर्विस एसोसिएशन ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे हड़ताल जैसे बड़े कदम उठा सकते हैं। उनका कहना है कि संजय सिंह की मौत एक चेतावनी है, और इसे नजरअंदाज करना भविष्य में और नुकसानदायक हो सकता है।

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सरकार के सामने चुनौती और समाधान

यह घटना सरकार के लिए एक सबक है। राजस्व बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए कर्मचारियों की सेहत को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। सरकार को चाहिए कि वह जीएसटी विभाग की कार्यप्रणाली की समीक्षा करे। टारगेट्स को निर्धारित करने से पहले जमीनी स्तर पर अध्ययन किया जाए। इसके साथ ही, अधिकारियों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम और मेंटल हेल्थ सपोर्ट सिस्टम शुरू किए जाएं। व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक टूल्स की जगह एक प्रोफेशनल डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया जाए, जिसमें काम के घंटों का ध्यान रखा जाए।

समाज का दायित्व

यह मामला सिर्फ सरकार और अधिकारियों तक सीमित नहीं है। समाज के तौर पर हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर नौकरी में एक इंसान काम करता है, जिसकी अपनी भावनाएं और सीमाएं होती हैं। संजय सिंह जैसे लोगों के लिए परिवार और दोस्तों का सपोर्ट बेहद जरूरी होता है। हमें अपने आसपास के लोगों की मानसिक स्थिति पर नजर रखनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करनी चाहिए।

GST डिप्टी कमिश्नर संजय सिंह की आत्महत्या और इसके बाद 800 अधिकारियों द्वारा स्टेट टैक्स व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ना एक गंभीर संकेत है। यह घटना हमें बताती है कि कार्यस्थल का दबाव कितना खतरनाक हो सकता है। आज 15 मार्च 2025 है, और यह मामला अभी भी गर्म है। उम्मीद है कि सरकार और विभाग इस घटना से सबक लेंगे और अधिकारियों के हित में ठोस कदम उठाएंगे। संजय सिंह की मौत एक त्रासदी है, लेकिन अगर इससे सकारात्मक बदलाव आते हैं, तो उनकी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। यह समय है कि हम सब मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं, जहां काम और जीवन के बीच संतुलन हो, और हर इंसान की कीमत समझी जाए।

कारगिल विजय दिवस: वीरता और बलिदान की जीत

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कारगिल विजय दिवस: वीरता और बलिदान की जीत

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हर साल 26 जुलाई को मनाया जाने वाला कारगिल विजय दिवस, 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों के वीरतापूर्ण प्रयासों और बलिदानों की याद दिलाता है। यह दिन ऑपरेशन विजय के सफल समापन का प्रतीक है, जब भारतीय सशस्त्र बल ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से कारगिल की चोटियों को वापस हासिल किया था। यह जीत सिर्फ़ एक सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए असाधारण परिस्थितियों में लड़ने वाले अधिकारियों की हिम्मत, समर्पण और लचीलेपन की पुष्टि थी।

संघर्ष की शुरुआत

कारगिल युद्ध 13,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई पर लड़ा गया एक विशेष संघर्ष था। इसकी शुरुआत मई 1999 में हुई थी, जब पाकिस्तानी सैनिकों और कार्यकर्ताओं ने कश्मीरी कार्यकर्ताओं के वेश में जम्मू और कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के भारतीय हिस्से पर हमला किया था। इसका उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच संपर्क को काटना और इलाके में दबाव बनाना था, संभवतः नियंत्रण रेखा को संशोधित करना और दोनों देशों के बीच शुरू की गई शांति योजना को प्रभावित करना।

आरंभिक झटका और लामबंदी

इस रुकावट को सबसे पहले स्थानीय चरवाहों ने पहचाना और जल्द ही भारतीय सेना को स्थिति की गंभीरता का पता चल गया। परिदृश्य, जलवायु और दुश्मन की प्रमुख स्थिति ने बड़ी चुनौतियों को प्रदर्शित किया। घुसपैठियों ने चोटियों पर अच्छी तरह से किलेबंद स्थिति बना ली थी, जिससे उन्हें महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ मिला। इन चुनौतियों के बावजूद, भारतीय सशस्त्र बल ने तेजी से अपनी ताकत जुटाई और कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस पाने के लिए ऑपरेशन विजय को आगे बढ़ाया।

लड़ाई और नायक

कारगिल युद्ध में कई भयंकर लड़ाइयाँ हुईं, जिसमें योद्धाओं ने असाधारण वीरता और आत्मविश्वास दिखाया। कुछ सबसे शानदार लड़ाइयों में शामिल हैं:

  • टोलोलिंग की लड़ाई: यह सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक थी, जिसमें भारतीय सैनिकों को गंभीर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन अंततः वे टोलोलिंग शिखर पर कब्जा करने में सफल रहे। यह जीत बाद के अभियानों के लिए महत्वपूर्ण थी।
  • टाइगर स्लोप पर कब्ज़ा: यह सबसे कुख्यात और जानबूझकर महत्वपूर्ण जीतों में से एक थी। टाइगर स्लोप पर कब्ज़ा करने के अभियान में कठोर चढ़ाई और भयंकर युद्ध शामिल थे। इस मिशन के दौरान सैनिकों द्वारा दिखाई गई बहादुरी पौराणिक बन गई।
  • प्वाइंट 4875 की लड़ाई: इसमें सैनिकों ने आग के नीचे असाधारण साहस का प्रदर्शन करते हुए गंभीर लड़ाई लड़ी। कैप्टन विक्रम बत्रा, जिन्होंने व्यापक रूप से कहा, “यह दिल मांगे मोर!” को इस लड़ाई में उनकी गतिविधियों के लिए मृत्यु के बाद परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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इन लड़ाइयों ने भारतीय सैनिकों की अजेय आत्मा को उजागर किया, जिन्होंने एक स्थिर दुश्मन, कठिन क्षेत्र और प्रतिकूल जलवायु का सामना करने के बावजूद, खोए हुए क्षेत्र को पुनः प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की।

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विजय की प्राप्ति

कारगिल युद्ध में विजय भारी कीमत पर मिली। इस युद्ध में 527 भारतीय सैनिकों की जान चली गई, जबकि कई अन्य घायल हो गए। इन साहसी आत्माओं द्वारा किए गए बलिदान व्यर्थ नहीं गए, क्योंकि उन्होंने भारतीय सीमाओं की पवित्रता की गारंटी दी और किसी भी कीमत पर अपने प्रभुत्व को सुनिश्चित करने के राष्ट्र के संकल्प को दर्शाया।

कारगिल विजय दिवस की वसीयत

कारगिल विजय दिवस सम्मान का दिन है; यह देशभक्ति की भावना और शांति और सुरक्षा की निरंतर इच्छा का उत्सव है। यह सैनिकों और उनके परिवारों द्वारा किए गए बलिदानों को नवीनीकृत करने का कार्य करता है। देश भर में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों और समारोहों में वीरों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जिसमें मुख्य समारोह द्रास में कारगिल युद्ध समर्पण समारोह में होता है, जहाँ योद्धा और नागरिक एक साथ मिलकर नायकों का सम्मान करते हैं।

शैक्षणिक संस्थान, सरकारी कार्यालय और विभिन्न संगठन इस दिन की महत्ता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम आयोजित करते हैं। वीरता की कहानियाँ सुनाई जाती हैं और युवा पीढ़ी को कारगिल युद्ध के इतिहास और महत्व के बारे में बताने के लिए वृत्तचित्र और फ़िल्में दिखाई जाती हैं।

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सीखे गए सबक

कारगिल युद्ध ने सतर्कता और तत्परता के महत्व को रेखांकित किया। इसने भारत की रक्षा व्यवस्था और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव किए। इस युद्ध ने बेहतर अंतर्दृष्टि और अवलोकन की आवश्यकता को उजागर किया, जिससे सुसज्जित शक्तियों और अंतर्दृष्टि कार्यालयों के बीच बेहतर समन्वय हुआ। युद्ध ने सैन्य हार्डवेयर और नींव के आधुनिकीकरण को भी प्रेरित किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारतीय सशस्त्र बल भविष्य की किसी भी चुनौती से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हैं।

निष्कर्ष

कारगिल विजय दिवस प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का दिन है। यह दिन भारतीय सशस्त्र बलों की बहादुरी, समर्पण और तपस्या को याद रखने और उनका सम्मान करने का दिन है। कारगिल युद्ध की बहादुरी की कहानियाँ युगों को जगाती हैं और कर्तव्य और देशभक्ति की भावना पैदा करती हैं। जैसा कि हम इस दिन को मनाते हैं, आइए हम उन मूल्यों और विश्वासों को बनाए रखने का वादा करें जिनके लिए हमारे योद्धाओं ने लड़ाई लड़ी और यह गारंटी दें कि उनकी तपस्या को कभी नहीं भुलाया जाएगा।

इस कारगिल विजय दिवस पर, आइए हम उन वीरों को सलाम करें जिन्होंने हमने पूर्ण समर्पण किया है और राष्ट्र की एकजुटता और उत्साह के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की है। जय हिंद!

कांग्रेस का खत्म होता हुआ अस्तित्व

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कांग्रेस

कहा जाता है कि डूबते जहाज में कोई सवारी नहीं करना चाहता। यही स्थिति आज भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की हो गई है| केवल एक परिवार के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने की परंपरा के कारण देश की इस सबसे पुरानी पार्टी का लोकतंत्र खत्म हो चुका है, इसी कारण यह अब अपने अस्तित्व के संकट के दौर से गुजर रही है|

आलम यह है कि भारतीय जनता पार्टी जो कि विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है उसके विशाल संगठन के विरोध में गठित इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व जिस कांग्रेस को सिरमौर बनाकर करना चाहिए था, आज वह स्वयं दयनीय अवस्था में है और विभिन्न क्षेत्रीय दलों की कृपा पर निर्भर रहने को विवश है| उसके नेतागढ़ एक-एक करके पार्टी छोड़ रहे हैं और भाजपा का दामन थाम रहे हैं| ऐसा लग रहा है कि अपने नेताओं को रोकने का कोई प्रयास तक कांग्रेस पार्टी नहीं कर पा रही है|

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पूरे भारत में सिकुड़ रही है कांग्रेस

पश्चिम बंगाल हो या पंजाब, बिहार हो या महाराष्ट्र, दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश या फिर अन्य कोई राज्य, आज कहीं पर भी कांग्रेस का मोल -भाव की स्थिति में नहीं है| छोटे-छोटे दल उसे आंख दिखाने लगे हैं| जिसे देखो, वहीं इस पार्टी को नसीहत देता नजर आ रहा है| इससे आम लोगों में इस पार्टी की छवि काफी खराब हो चुकी है| स्थिति यह है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ही अपना आत्मविश्वास खो चुका है| उसके पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने देशभर में न्याय यात्राएं निकाली|

लेकिन ऐसा लगता है की उससे भी बात नहीं बनी और वह लोगों का भरोसा तक नहीं जीत सके, तो थक हार कर उन्होंने दक्षिण की अपनी सीट पर ही ध्यान लगना समझा| इन दोनों तो कांग्रेस व राहुल गांधी से ज्यादा खबरें आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं की आती है| इस पार्टी को छोड़ रहे लोगों का यह भी कहना है कि पार्टी नेतृत्व की सनातन धर्म विरोधी व राष्ट्र विरोधी सोच को वे
स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं| पार्टी नेताओं के बढ़बोलेपन से रही-सही कसर भी पूरी हो जाती है| ऐसे में, कोई भी भला कब तक इस पार्टी से जुड़ा रह सकता है?

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पुरानी सोच से नहीं उबर पाई है कांग्रेस

आज जब भारतीय राजनीती की तस्वीर कहीं ज्यादा स्पष्ट है और पार्टियां अपनी विचारधारा खुलकर जनता के सामने रखती हैं, तो हिन्दुओं की अवहेलना करना कांग्रेस को भारी पड़ रहा है| भाजपा को इसी बात का फायदा मिला है और वह आज सत्ता में है| क्योंकि यह पार्टी अभी पुरानी सोच से उभर नहीं पाई है, इसीलिए वह डूबने के कगार पर पहुंच गई है| जिस तरह से उसके कई नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, उससे लगता यही है कि जल्द ही पार्टी का पूरा अस्तित्व खत्म हो जाएगा| बहुत ज्यादा दिनों तक इसे संभालना अब लगभग नामुमकिन जान पड़ता है|

कांग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र जारी करने के साथ ही अपना आगामी एजेंडा सामने रख दिया है| कांग्रेस के घोषणा पत्र में युवाओं, महिलाओं, किसानों, श्रमिकों, संविधान, अर्थव्यवस्था, संघवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण पर ज्यादा देने ध्यान देने की कोशिश हुई है|पिछड़ी जातियों के उत्थान के प्रति कांग्रेस की घोषणाएं विशेष रूप से चर्चा का विषय बन रही हैं लेकिन बात यह है कि क्या यह पार्टी अपने इन सभी वादों को पूरा कर पाएगी? और उससे पहले एक और सवाल यह है कि है कि क्या यह पार्टी सत्ता में आ पाएगी क्योंकि इस पार्टी की जो वर्तमान समय में हालात दिख रही है उससे लगता तो नहीं है कि वह सत्ता में आ पाएगी|

हिंदू धर्म को जातियों में बांटना चाहती है कांग्रेस

क्योंकि कांग्रेस पार्टी में आंतरिक फूट पड़ी हुई है, कई बड़े-छोटे नेता पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम रहे हैं| जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है|बेशक, संविधान लागू होने के कई साल बाद भी जातिगत भेदभाव पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है और इसे खत्म करने के लिए देश की आने वाली सरकारों को सकारात्मक उपायों के साथ काम करना होगा| अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने इस मंशा को जाहिर करने की कोशिश की है|

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विकास की दौड़ में पीछे रह गए लोगों के लिए हर पार्टी को पहल करनी ही चाहिए| कांग्रेस के घोषणा पत्र में यह बताया गया है कि सत्ता में आने के बाद वह पिछड़ी जातियों का भला करेगी, लेकिन पिछले 70 सालों में इस पार्टी ने पिछड़ी जातियों को सिर्फ शेखचिल्ली के सपने ही दिखाएँ हैं| और रही बात जातिगत जनगणना कराने की तो इस सोंच से केवल हिंदू धर्म को बांटने की शाजिस रची जा रही है जो कांग्रेस ने अपने पिछले शाशनकालों में किया|

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